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प्रवासियों को पनाह के साथ सहानुभूति की जरूरत- स्वामी चिदानन्द सरस्वती

विक्की सैनी
20 जून, ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने विश्व शरणार्थी दिवस के अवसर कहा कि पर भारत सहित विश्व के वे लोग जिन्हें हिंसा और संघर्ष के कारण अपनी मातृभूमि और जन्मभूमि को छोड़कर कहीं और शरणार्थी के रूप में रहना पड़ रहा है कौन अपनी मर्जी से अपने वतन को छोड़ना चाहता है। माना कि जिन्दगी हादसों का एक पुलिंदा है परन्तु कौन खुशी से अपना वतन छोड़ना चाहता है कौन विस्थापित होना चाहता है और कौन अपनी मर्जी से अपना घर छोड़कर प्रवासी शिविरों में अपना जीवन बिताना चाहता है, बस असुरक्षा ही उन्हें यह करने पर मजबूर करती है। शरणार्थियों का जो दर्द और छटपटाहट है वह आज हम अपने देश के प्रवासी मजदूरों के रूप में देख सकते है। आज सभी प्रवासियों को पनाह के साथ परवाह और शिविरों के साथ सहानुभूति की जरूरत है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि कोरोना संकट से आज पूरी दुनिया दहशत में है। यह वायरस द्रुत गति से लोगों को अपना शिकार बना रहा है वहीं चारों ओर आर्थिक मंदी भी ला रहा है। इसने शक्तिशाली राष्ट्रों को आर्थिक रूप से तोड़ कर रख दिया है ऐसे में सभी को अपने मनोबल को मजबूत रखना होगा। विश्व भर के शरणार्थियों की शक्ति, हिम्मत और दृढ़ निश्चय एवं उनके प्रति सम्मान को स्वीकृति देने के लिये संयुक्त राष्ट्र 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस के रूप में मनाता है। विश्व शरणार्थी दिवस प्रत्येक वर्ष 20 जून को मनाया जाता है, इस दिन उन लोगों के साहस, शक्ति और संकल्प के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है, जिन्हें प्रताड़ना, संघर्ष और हिंसा की चुनौतियों के कारण अपना देश छोड़कर बाहर जाने को मजबूर होना पड़ता है। वस्तुतः शरणार्थियों की दुर्दशा और समस्याओं का समाधान करने के लिये ही इस दिवस को मनाया जाता है। 4 दिसंबर, 2000 को संयुक्त राष्ट्र परिषद द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया गया था।
भारत में मजदूर जब गाँव से शहर जाते है तो उसे माइग्रेशन कहा जाता है और ऐसा करने वाले मजदूरों को प्रवासी मजदूरों की संज्ञा दी गई. अब जब कोरोन संकट के समय वे शहरों में जहां वह कार्य कर रहे थे वहां पर उनके आय का जरिया ही नहीं बचा तो ये प्रवासी मजदूर अपने गाँव वापस लौट रहे हैं और कुछ लौट गये हैं। आज इन सभी को आत्मनिर्भर बनाने के लिये सरकार के साथ सभी को एकजुट होना होगा ताकि उन्हें फिर से ऐसी समस्याओं का सामना न करना पडें।

वर्ष 1989 -1990 के बीच कश्मीर घाटी में पैदा हुए हालात के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी हिन्दू परिवार अपना घर और जमीनों को छोड़ कर वहां से निकल आए थे. सबसे अधिक कश्मीरी पंडित 19 जनवरी, 1990 के दिन से वहां से विस्थापित हुए थे। कश्मीरी पंड़ितों का कश्मीर से पलायन हुआ और उन्हें अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहना पड़ा और अब तक भी उनकी समस्या बनी हुई है। धन्य हो वर्तमान सरकार का जिन्होंने निश्चय किया है कि कश्मीरी पंडितों को उनके पैतृक स्थानों पर ही बसाया जाये, उन्हें उनका सम्मान वापस मिले तथा वे अपनी जमीनों के हकदार हो सके। स्वामी जी ने कहा कि शरणार्थी होना किसी के लिये भी पीड़ा की बात है लेकिन आज समय आया है कि सभी शरणार्थी, खास कर कश्मीरी पंडितों के लिये हम सभी को मिलकर कार्य करना होगा ताकि वे भी अपनी जमीन, हिन्दू संस्कृति की जड़ों तथा अपने मूल्यों से जुड़ सके।

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